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बांग्लादेश में शफीकुर रहमान की जमात-ए-इस्लामी बनेगी बदलाव का चेहरा? कट्टरपंथ से है गहरा रिश्ता

Edited By: Amit Mishra @AmitMishra64927
Published : Feb 10, 2026 02:41 pm IST, Updated : Feb 10, 2026 02:41 pm IST

बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव होने जा रहे हैं। चुनाव से पहले बांग्‍लादेश की जमात-ए-इस्लामी पार्टी सियासत के केंद्र में आ गई है। यह वो पार्टी है जिसे एक दशक से ज्यादा वक्त तक चुनाव लड़ने से रोका गया था।

बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी पार्टी के प्रमुख शफीकुर रहमान- India TV Hindi
Image Source : AP बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी पार्टी के प्रमुख शफीकुर रहमान

Bangladesh Elections 2026: बांग्लादेश की राजनीति निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। आगामी आम चुनाव ना केवल सत्ता परिवर्तन की संभावना लेकर आए हैं, बल्कि देश की वैचारिक दिशा को भी तय करेंगे। इस चुनावी माहौल में जमात-ए-इस्लामी और उसके प्रमुख शफीक़ुर रहमान की भूमिका भी खासी अहम हो जाती है। बांग्लादेश में एक बार फिर जमात का सियासी ग्राफ उभार पर है और इसकी सीधी टक्कर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी से है।

जमात का पाकिस्तान प्रेम

पाकिस्तान से अगल होने के बाद से ही बांग्लादेश की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक राजनीति के बीच संघर्ष देखने को मिला है। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान जमात-ए-इस्लामी पर पाकिस्तान का साथ देने के गंभीर आरोप लगे थे। यही कारण है कि आज भी इस पार्टी को मुक्ति संग्राम विरोधी के रूप में देखा जाता है। इन आरोपों ने जमात की स्वीकार्यता को हमेशा ही प्रभावित किया है। लेकिन, आज जब अवामी लीग पर बैन है तो जमात खुद को एक विकल्प के रूप में पेश कर रही है।

जमात करती है इस्लामी शासन की वकालत

माना जाता है कि जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा इस्लामी शासन और शरीयत आधारित व्यवस्था पर केंद्रित रही है। इसे कट्टरपंथ से भी जोड़कर देखा जाता है। पार्टी का तर्क है कि बांग्लादेश की राजनीति को इस्लामी मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। इससे इतर आलोचकों का कहना है कि यह विचारधारा देश के संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत से टकराती है। इसी टकराव ने जमात को विवादों के केंद्र में रखा है।

बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी पार्टी के समर्थक

Image Source : AP
बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी पार्टी के समर्थक

2013 में पार्टी पर आया था संकट

2013 में बांग्लादेश की अदालत द्वारा जमात-ए-इस्लामी का पंजीकरण रद्द किया जाना एक ऐतिहासिक फैसला था। इस फैसले के बाद पार्टी कानूनी रूप से चुनाव लड़ने में अयोग्य हो गई थी। सरकार का कहना था कि जमात का संविधान देश के संविधान के अनुरूप नहीं है। इस कदम को अवामी लीग सरकार ने लोकतंत्र और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया था जबकि विपक्ष ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई करार दिया था।

खत्म नहीं हुआ पार्टी का प्रभाव

चुनावी प्रतिबंध के बावजूद जमात-ए-इस्लामी का सियासी कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। मदरसों, धार्मिक संगठनों और छात्र समूहों के माध्यम से पार्टी का प्रभाव जमीनी स्तर पर बना रहा। इसी दौरान शफीकुर रहमान का उदय खासा अहम हो जाता है।  मौजूदा समय में रहमान जमात-ए-इस्लामी का सबसे बड़ा फेस हैं और इन्हें पार्टी का अपेक्षाकृत नरम चेहरा माना जाता है। शफीकुर रहमान ने कट्टरपंथ की राजनीति से दूरी बनाने और लोकतंत्र, मानवाधिकार तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करके पार्टी की छवि सुधारने की कोशिश की है। 

BNP और जमात के बीच सीधी टक्कर

इस बार चुनाव में शफीकुर रहमान की जमात और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के बीच सीधी टक्कर है। अतीत में BNP और जमात का गठबंधन सत्ता तक पहुंच चुका है। जमात और नए सियासी दल नेशनल सिटीजन पार्टी के बीच गठजोड़ हुआ है। ऐसे में साफ है कि बांग्लादेश की राजनीति में जमात-ए-इस्लामी अपना दबदबा कायम करना चाहती है। शफीकुर रहमान को चुनाव में सफलता मिलेगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बांग्लादेशी समाज धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक राजनीति के बीच किसमें अपना भविष्य देखता है।

बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी पार्टी के समर्थक

Image Source : AP
बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी पार्टी के समर्थक

कौन हैं शफीकुर रहमान?

शफीकुर रहमान का जन्म 1958 में बांग्लादेश के पूर्वोत्तर क्षेत्र के मौलवी बाजार जिले में हुआ था। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और सिलहट के एमएजी उस्मानी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की है। डॉक्टरी के पेशे के साथ-साथ वो छात्र काल से ही राजनीति में सक्रिय रहे। बाद में वो जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिविर से जुड़ गए। 

शफीकुर बने जमात के प्रमुख

शफीकुर रहमान ने पिछले कुछ वर्षों में पार्टी में लगातार प्रगति की है और विभिन्न संगठनात्मक जिम्मेदारियों को संभालने के बाद 2019 में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी की आंतरिक प्रक्रिया के तहत पार्टी के अमीर (प्रमुख) चुने गए। उनका यह नेतृत्व उस दौर में आया जब जमात-ए-इस्लामी को कानूनी मुश्किलों, चुनावी नाकामियों और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता को लेकर गंभीर सवालों का सामना करना पड़ रहा था।

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